Author(s): रिचा सिंह १ , डॉ॰ पवन कुमार सिंह २
सार:
इस परिवर्तनशील संसार में जड़ और चेतन के बीच मनुष्य सर्वाधिक विकसित चेतन शक्ति से युक्त प्राणी है। स्त्री और पुरुष दोनों की मानसिकता और विचार-सरणियाँ उनके परिवेश तथा परिस्थितियों से निर्मित होती हैं। ‘चेतना’ मूलतः मन की वह सक्रिय शक्ति है, जिसमें विचार, अनुभूति और विवेक निहित रहते हैं। यह चेतना अचानक उत्पन्न नहीं हो जाती, बल्कि दीर्घकालीन संघर्ष, सामाजिक अनुभव, ऐतिहासिक परिस्थितियों और निरंतर प्रयासों से तैयार होती है। इसी चेतन-विकास के परिणामस्वरूप हिन्दी साहित्य में ‘स्त्री-विमर्श’ और ‘दलित-विमर्श’ जैसे प्रवाह उभरकर सामने आए, जिन्होंने भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही असमानता, शोषण, हिंसा, अन्याय और अस्तित्व-संकट जैसे प्रश्नों पर जागरूकता फैलाने का कार्य किया। प्रेमचन्द ने अपने युग के सामाजिक संदर्भ में नारी की दासता, संघर्ष, आत्मबल और प्रतिरोध को गहरी संवेदनशीलता से देखा-बूझा और उसे अपने उपन्यासों के नारी-पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। ‘निर्मला’, ‘सेवासदन’, ‘प्रतिज्ञा’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’, ‘गोदान’ आदि उपन्यासों की नारी छवियाँ न केवल अपने समय की दैन्य परिस्थितियों को उजागर करती हैं, बल्कि उनमें निहित अदम्य साहस, अस्मिता-बोध और क्रान्तिशील चेतना आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है।
मुख्य शब्द: असमानता, परिवेश, आत्मस्वतंत्रता, मानव सभ्यता, अस्तित्व-संकट, स्त्री-विमर्श
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आत्मस्वतंत्रता के लिए संघर्षरत प्रेमचंद के स्त्री पात्र
Pages:4-11
