Volume 12, Issue 11, November - 2025

राष्ट्रीय मूल्यो के विकास में रामधारी सिंह दिनकर के काव्य रचनाओं की भूमिका

Author(s): प्रो. छत्रसाल सिंह

सारांश:

राष्ट्रीय शिक्षा, एक ऐसी शिक्षा है जो छात्र-छात्राओं में देश के प्रति प्रेम, निष्ठा, कर्तव्य-बोध, राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करे। केवल पुस्तकीय ज्ञान देने के वजाय, राष्ट्रीय शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो देश की प्रगति में सक्रिय भूमिका निभाएँ। राष्ट्रीय शिक्षा छात्र-छात्राओं को भारत के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम, महान व्यक्तित्वों, संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों से परिचित कराती है। इससे उनमें राष्ट्रीय गौरव और आत्मविश्वास की भावना जागृत होती है।राष्ट्रीय शिक्षा में सत्य, अहिंसा, एकता, सहिष्णुता, सहयोग, त्याग और सेवा जैसे नैतिक मूल्यों पर बल दिया जाता है। इन मूल्यों से छात्र-छात्राओं में सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व विकसित होता है। राष्ट्र कवि दिनकर जी के काव्य में अपने युग की पीड़ा का मार्मिक अंकन हुआ है । उनके काव्य में भारतीय संस्कृति की पूर्ण झलक के साथ ही साथ सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतना का अलौकिक दृश्य भी परिलक्षित होता है। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना का व्यापक एवं दिव्य स्वरूप दिखाई पड़ता है। एक ओर उनकी कविता में हुंकार है तो दूसरी ओर शोषित पीड़ित उपेक्षित भारतीयों को जगाने के लिए वे क्रान्ति की मशाल लिए खड़े हैं। परशुराम की प्रतीक्षा में वे सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर को दर्शाते हुए उनके शौर्य एवं वीरोचित भाव को दिखाते हैं। दूसरी तरफ वे गांधीवाद से प्रभावित होने के कारण मानवीय मूल्य की गौरवमयी गाथा को भी गाते हैं। उनकी कविता में जहां राष्ट्र जागरण जनजागरण की ज्वाला दिखाई देती है वहीं वे आम आदमी के साथ खड़े हो कदम से कदम मिला देश धर्म की मिट्टी के मूल्य चुकाने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

संकेत शब्द: सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय कवि, जनजागरण, राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रहित, राष्ट्रीय मूल्य

DOI: 10.61165/sk.publisher.v12i11.2

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राष्ट्रीय मूल्यो के विकास में रामधारी सिंह दिनकर के काव्य रचनाओं की भूमिका


Pages:9-17

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प्रो. छत्रसाल सिंह. (2025). राष्ट्रीय मूल्यो के विकास में रामधारी सिंह दिनकर के काव्य रचनाओं की भूमिका. SK INTERNATIONAL JOURNAL OF MULTIDISCIPLINARY RESEARCH HUB, 12(11), 9–17. https://doi.org/10.61165/sk.publisher.v12i11.2

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